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रविवार, 22 दिसंबर 2013

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भय

मनुष्य के हृदय में भय का साम्राज्य रहता है सदा , कभी संपत्ति के नाश का भय कभी अपमान का भय कभी अपनों से छूट जानो का भय इसीलिए भय का होना सबको स्वाभाविक ही लगता है , क्या कभी विचार किया है जो स्तिथि अथवा वास्तु भय को जन्म देती है क्या वही से वास्तव में दुःख आता है,  नहीं ऐसा तोह कोई नियम नहीं और सबका अनुभव तो यह बताता है कि भय धारण  करने से भविष्य के दुःख का निवारण नहीं होता भय केवल आने वाले दुःख कि कल्पनामात्र ही है ,वास्तविकता से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है  तो क्या यह जानते हुए भी की भय कुछ और नहीं केवल कल्पनामात्र ही है , इससे मुक्त होकर निर्भय बन पाना क्या बहुत कठिन है ।

अवश्य विचार कीजियेगा....।  

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