पिता और संतान
पिता सदा ही अपने संतान के सुख की कामना करते है , उनके भविष्य की चिंता करते रहते है इसी कारन वस् सदा ही अपने संतानो के भविष्य का मार्ग स्वयं ही निस्चित करने का प्रयत्न करते रहते है । जिस मार्ग पर पिता स्वयं चला है जिस मार्ग के कंकर पत्थर को स्वयं देखा है ,मार्ग कि छाया मार्ग की धुप को स्वयं जाना है उसी मार्ग पर उसका पुत्र भी चले यही इक्छा रहती है हर पिता की , निसंदे: उत्तम भावना है यह किन्तु ३ प्रष्न के ऊपर विचार करना हम भूल ही जाते है। .... कौन से प्रष्न। .?
प्रथम प्रष्न क्या समय के साथ प्रत्येक मार्ग बदल नहीं जाते?क्या समय सदा ही नई चुनौतियों को लेकर नहीं आता ? तो फिर बीते हुए समय क अनुभव नई पीड़ी को किस प्रकार लाभ दे सकते है ?
दूसरा प्रष्न क्या प्रत्येक संतान अपने माता पिता की छवि होता है, हा संतानो को संस्कार तो अवश्य ही माता पिता देते है किन्तु भीतर कि क्षमता तो ईश्वर ही देते है तोह जिस मार्ग पर पिता को सफलता मिली है विश्वास है कि उसी मार्ग पर उसके संतानो को भी सफलता और सुख प्राप्त होगा ?
तीसरा प्रष्न क्या जीवन के संगर्ष और चुनौतिया लाभकारी नहीं होती क्या प्रत्येक नया प्रष्न एक उत्तर का द्वार नहीं खोलता तोह फिर संतानो को नए नए संघर्षो , प्रष्नो और चुनौतियों से दूर रखना यह उनके लिए लाभ करना कहलायेगा या हानि पहुचाना ? अर्थात जिस प्रकार संतान के भविष्य के निर्माण करने से पहले उसके चरित्र का निर्माण करना आवस्यक है वैसे ही संतानो के जीवन का मार्ग निश्चित करने से पहले उन्हें नए संघर्षो के साथ जूझने के लिए मनोबल व ज्ञान देना अधिक लाभदायक नहीं होगा ?
स्वयं विचार कीजिये। ……
प्रथम प्रष्न क्या समय के साथ प्रत्येक मार्ग बदल नहीं जाते?क्या समय सदा ही नई चुनौतियों को लेकर नहीं आता ? तो फिर बीते हुए समय क अनुभव नई पीड़ी को किस प्रकार लाभ दे सकते है ?
दूसरा प्रष्न क्या प्रत्येक संतान अपने माता पिता की छवि होता है, हा संतानो को संस्कार तो अवश्य ही माता पिता देते है किन्तु भीतर कि क्षमता तो ईश्वर ही देते है तोह जिस मार्ग पर पिता को सफलता मिली है विश्वास है कि उसी मार्ग पर उसके संतानो को भी सफलता और सुख प्राप्त होगा ?
तीसरा प्रष्न क्या जीवन के संगर्ष और चुनौतिया लाभकारी नहीं होती क्या प्रत्येक नया प्रष्न एक उत्तर का द्वार नहीं खोलता तोह फिर संतानो को नए नए संघर्षो , प्रष्नो और चुनौतियों से दूर रखना यह उनके लिए लाभ करना कहलायेगा या हानि पहुचाना ? अर्थात जिस प्रकार संतान के भविष्य के निर्माण करने से पहले उसके चरित्र का निर्माण करना आवस्यक है वैसे ही संतानो के जीवन का मार्ग निश्चित करने से पहले उन्हें नए संघर्षो के साथ जूझने के लिए मनोबल व ज्ञान देना अधिक लाभदायक नहीं होगा ?
स्वयं विचार कीजिये। ……

0 टिप्पणियाँ: